श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  7.156.118 
दुर्योधन उवाच
न त्वेतदद्भुतं मन्ये यत् ते महदिदं मन:।
अस्मासु च परा भक्तिस्तव गौतमिनन्दन॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन ने कहा- हे गौतमीपुत्र! तुम्हारा हृदय इतना विशाल है कि मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं लगता कि तुमने ऐसा किया। हम लोगों के प्रति तुम्हारा स्नेह बहुत अधिक है ॥118॥
 
Duryodhan said- O son of Gautami! Your heart is so big that I do not consider it surprising that you have done this. Your affection for us is very high. ॥ 118॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)