श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 151: द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.151.10 
यान् स्म तान् ग्लहते तात शकुनि: कुरुसंसदि।
अक्षान् न तेऽक्षा निशिता बाणास्ते शत्रुतापना:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
पासों के खेल के समय विदुर जी ने तुमसे कहा था, 'बेटा, शकुनि कौरव सभा में जो पासे फेंक रहा है, उन्हें पासे मत समझो। वे किसी दिन तीखे बाण बनकर शत्रुओं को पीड़ा पहुँचाएँगे।'॥10॥
 
During the game of dice, Vidur ji had said to you, 'Son, do not consider the dice that Shakuni is throwing in the Kaurava assembly as dice. They can someday become sharp arrows that will cause torment to the enemies.'॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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