श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  7.150.36 
न हि मे जीवितेनार्थस्तानृते पुरुषर्षभान्।
आचार्य: पाण्डुपुत्राणामनुजानातु नो भवान्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
उन रत्नों के बिना मेरे जीने का कोई अर्थ नहीं है। आप हम पाण्डुपुत्रों के गुरु हैं, अतः मुझे जाने की अनुमति दीजिए। 36।
 
There is no point in my living without those gems of a man. You are the teacher of us sons of Pandu, so please give me permission to leave. 36.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनानुतापे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका अनुतापविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)