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श्लोक  7.149.25 
धनंजयसखा यश्च धनंजयहितश्च य:।
धनंजयस्य गोप्ता तं प्रपद्य सुखमेधते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो अर्जुन के मित्र, अर्जुन के हितैषी और अर्जुन के रक्षक हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आकर मनुष्य सुखी हो जाता है॥25॥
 
Man becomes happy by taking refuge in Lord Krishna who is Arjuna's friend, Arjuna's well-wisher and Arjuna's protector. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)