श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  7.147.80 
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कुशलो ह्यसि भाषितुम्।
असह्यं तमहं मन्ये तन्ममाचक्ष्व संजय॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
मैं यह सुनना चाहता हूँ। आप कथा सुनाने में बहुत कुशल हैं। मैं सात्यकि को किसी के लिए भी असह्य मानता हूँ, इसलिए संजय! आप मुझे सब कुछ स्पष्ट रूप से बताएँ। 80.
 
I wish to hear this. You are very skilled in narrating stories. I consider Satyaki unbearable for anyone, so Sanjaya! You tell me everything clearly. 80.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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