श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  7.147.78-79 
धृतराष्ट्र उवाच
अजय्यं वासुदेवस्य रथमास्थाय सात्यकि:।
विरथं कृतवान् कर्णं वासुदेवसमो युधि॥ ७८॥
दारुकेण समायुक्त: स्वबाहुबलदर्पित:।
कच्चिदन्यं समारूढ: सात्यकि: शत्रुतापन:॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र ने पूछा - संजय ! युद्ध में सात्यकि भगवान श्रीकृष्ण के समान हैं । उन्होंने श्रीकृष्ण के अजेय रथ पर सवार होकर कर्ण को रथहीन कर दिया था । उस समय उनके साथ दारुक जैसा सारथी था और उन्हें अपने बाहुबल का अभिमान था; किन्तु शत्रुओं को संताप देने वाले सात्यकि क्या कभी किसी अन्य रथ पर सवार हुए थे ?॥ 78-79॥
 
Dhritarashtra asked - Sanjay! Satyaki is equal to Lord Krishna in war. He rode on the invincible chariot of Krishna and made Karna chariotless. At that time he had a charioteer like Daruk with him and he was proud of his physical strength; but did Satyaki, who torments his enemies, ever ride on any other chariot?॥ 78-79॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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