श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  7.147.33-34h 
अलमेष महाबाहु: कर्णायैकोऽपि पाण्डव॥ ३३॥
किं पुनर्द्रौपदेयाभ्यां सहित: सात्वतर्षभ:।
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र! ये महाबाहु सात्वतशिरोमणि सात्यकि ही कर्ण के लिए पर्याप्त हैं। फिर इस समय जब द्रुपद के दोनों पुत्र उसके साथ हैं, तब तो कहना ही क्या है?
 
Son of Pandu! This Mahabahu Satvatsiromani Satyaki alone is enough for Karna. Then at this time when both the sons of Drupada are with him, then what can be said. 33 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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