श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  7.147.30-31h 
एष प्रयात्याधिरथि: सात्यके: स्यन्दनं प्रति॥ ३०॥
न मृष्यति हतं नूनं भूरिश्रवसमाहवे।
 
 
अनुवाद
यह अधिरथपुत्र कर्ण सात्यकि के रथ की ओर जा रहा है। निश्चय ही युद्धभूमि में भूरिश्रवा का वध उसके लिए असह्य हो गया है।
 
This Karna, son of Adhiratha, is going towards Satyaki's chariot. Surely the killing of Bhurishrava on the battlefield has become unbearable for him. 30 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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