श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  7.147.24-25h 
यत् तत् पूर्वमुपाकुर्वन्नस्त्रं मामब्रवीत् कृप:॥ २४॥
न कथंचन कौरव्य प्रहर्तव्यं गुराविति।
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में कृपाचार्य ने मुझे अस्त्रविद्या सिखाकर मुझसे कहा था - 'कुरुनन्दन! तुम्हें अपने गुरु पर किसी भी प्रकार से आक्रमण नहीं करना चाहिए।'॥24 1/2॥
 
‘In the past, after teaching me the art of weapons, Kripacharya had said to me, 'Kurunandan! You should not attack your guru in any way.'॥ 24 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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