श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  7.147.23-24h 
तदिदं नरकायाद्य कृतं कर्म मया ध्रुवम्॥ २३॥
आचार्यं शरवर्षेण रथे सादयता कृपम्।
 
 
अनुवाद
‘मैंने आचार्य कृपा को अपने बाणों की वर्षा करके रथ पर सुला दिया है। मैंने आज नरक जाने के लिए ही यह कर्म किया है।॥23 1/2॥
 
‘I have made Acharya Kripa sleep on the chariot by showering him with my arrows. I have surely done this deed only to go to hell today.॥ 23 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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