श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  7.147.18-19h 
अकामयानेन मया विशिखैरर्दितो भृशम्॥ १८॥
अवसीदन् रथोपस्थे प्राणान् पीडयतीव मे।
 
 
अनुवाद
‘मैंने न चाहते हुए भी अपने बाणों से उसे बहुत पीड़ा पहुँचाई है। वह रथ के आसन पर पड़ा हुआ मुझे अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है।॥18 1/2॥
 
‘I have hurt him a lot with my arrows even though I did not want to. He is suffering while lying in the chariot seat and is causing me great pain.॥ 18 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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