श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.147.17-18h 
को हि ब्राह्मणमाचार्यमभिद्रुह्येत मादृश:।
ऋषिपुत्रो ममाचार्यो द्रोणस्य परम: सखा॥ १७॥
एष शेते रथोपस्थे कृपो मद्‍बाणपीडित:।
 
 
अनुवाद
मेरे समान कौन ब्राह्मण और आचार्य का द्रोह करेगा? यह ऋषिपुत्र, मेरा गुरु और गुरु द्रोणाचार्य का परम मित्र कृपाचार्य मेरे बाणों से घायल होकर रथ के आसन पर लेटा हुआ है॥17 1/2॥
 
‘Who like me would betray a Brahmin and an Acharya? This son of a sage, my teacher and the best friend of Guru Dronacharya, Kripa, is lying in the seat of the chariot, wounded by my arrows.॥ 17 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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