श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  7.147.15-16 
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिन:॥ १५॥
तत्कृते ह्यद्य पश्यामि शरतल्पगतं गुरुम्।
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सत्यवादी विदुरजी का वह कथन आज सत्य हो रहा है। दुर्योधन के कारण आज मैं अपने गुरु को बाणों की शय्या पर लेटा हुआ देख रहा हूँ। क्षत्रियों के आचरण, बल और पौरुष को धिक्कार है! उन्हें धिक्कार है॥15-16॥
 
‘That statement of the truthful Viduraji is coming true today. Because of Duryodhan, today I see my Guru lying on the bed of arrows. Shame on the conduct, strength and manliness of the Kshatriya! Shame on them.॥ 15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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