श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 13-15h
 
 
श्लोक  7.147.13-15h 
पश्यन्निदं महाप्राज्ञ: क्षत्ता राजानमुक्तवान्॥ १३॥
कुलान्तकरणे पापे जातमात्रे सुयोधने।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसन:॥ १४॥
अस्माद्धि कुरुमुख्यानां महदुत्पत्स्यते भयम्।
 
 
अनुवाद
‘जब कुल का नाश करने वाला पापी दुर्योधन उत्पन्न हुआ, तब बुद्धिमान विदुर जी ने यह सब भयंकर परिणाम देखकर राजा धृतराष्ट्र से कहा था कि इस दुष्ट कुल के बालक को परलोक भेज देना ही अच्छा होगा, क्योंकि इससे प्रमुख कुरुवंशियों में बड़ा भय उत्पन्न होगा।’॥13-14 1/2॥
 
‘When the sinner Duryodhan, who was the destroyer of the family, was born, the wise Vidur ji, after seeing all these disastrous consequences, had said to King Dhritarashtra that it would be better if this child of a bad family is sent to the other world because he would cause great fear among the prominent Kuru dynasty members.’॥ 13-14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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