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श्लोक 7.146.144  |
स देवशत्रूनिव देवराज:
किरीटमाली व्यधमत् समन्तात्।
यथा तमांस्यभ्युदितस्तमोघ्न:
पूर्वप्रतिज्ञां समवाप्य वीर:॥ १४४॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे देवराज इन्द्र देवताओं के शत्रुओं का संहार करते हैं और जैसे तेजस्वी सूर्य उदय होकर अंधकार का नाश करते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी वीर अर्जुन अपनी प्रथम प्रतिज्ञा पूरी करके आपकी सेना का सब ओर से संहार करने लगे।।144।। |
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| Just as the King of Gods Indra kills the enemies of the gods and just as the bright Sun rises and destroys darkness, similarly the crown-wearing brave Arjun, after fulfilling his first promise, began destroying your army from all sides. 144. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि जयद्रथवधे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें जयद्रथवधविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४६॥
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