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श्लोक 7.146.119  |
न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते तव किंचन।
समस्तेष्वपि लोकेषु त्रिषु वासवनन्दन॥ ११९॥ |
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| अनुवाद |
| हे इन्द्रकुमार! सम्पूर्ण त्रिलोकी में ऐसा कोई कार्य नहीं है जो तुम्हारे लिए असम्भव हो अथवा जिसे तुम पूरा न कर सको ॥119॥ |
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| O Indrakumar! There is no task in the entire Triloki which is impossible for you or which you cannot accomplish.'॥ 119॥ |
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