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श्लोक 7.146.109-110h  |
क्षत्रियप्रवरो लोके नित्यं शूराभिसत्कृत:।
किं त्वस्य युध्यमानस्य संग्रामे क्षत्रियर्षभ:॥ १०९॥
शिरश्छेत्स्यति संक्रुद्ध: शत्रुरालक्षितो भुवि। |
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| अनुवाद |
| वह इस लोक के क्षत्रियों में श्रेष्ठ माना जाएगा। वीर योद्धा सदैव उसका आदर करेंगे; परंतु युद्धभूमि के अंत में कोई क्षत्रिय योद्धा उसका शत्रु बनकर उसके सामने खड़ा होकर क्रोधपूर्वक उसका सिर काट डालेगा।॥109 1/2॥ |
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| He will be considered the best among the Kshatriyas of this world. The brave warriors will always respect him; but at the end of the battle field, some Kshatriya warrior will become his enemy and stand in front of him and cut off his head in anger.'॥ 109 1/2॥ |
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