श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  7.142.2-3 
तमब्रवीन्महाराज कौरव्य: शिनिपुङ्गवम्।
अद्य प्राप्तोऽसि दिष्टॺा मे चक्षुर्विषयमित्युत॥ २॥
चिराभिलषितं काममहं प्राप्स्यामि संयुगे।
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन् यदि नोत्सृजसे रणम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस समय कुरुपुत्र भूरिश्रवाण ने सात्यकि से कहा, 'युयुधान! यह तुम्हारे सौभाग्य की बात है कि आज तुम मेरे नेत्रों के सामने आये हो। आज युद्ध में मैं अपनी चिरकालीन अभिलाषा पूर्ण करूँगा। यदि तुम युद्धभूमि छोड़कर भाग न जाओ, तो आज मेरे हाथों से जीवित नहीं बच पाओगे।'
 
Maharaj! At that time, son of Kuru, Bhurishravane said to Satyaki, 'Yuyudhaan! It is a matter of great fortune that you have come in front of my eyes today. Today, in the war, I will fulfill my long-standing desire. If you do not leave the battlefield and run away, then you will not escape alive from my hands today. 2-3.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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