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श्लोक 7.128.1  |
संजय उवाच
समुत्तीर्णं रथानीकं पाण्डवं विहसन् रणे।
विवारयिषुराचार्य: शरवर्षैरवाकिरत्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| संजय कहते हैं- महाराज! आचार्य द्रोण ने युद्ध में रथ सेना को पार करके आये हुए पाण्डु नन्दन भीमसेन पर हँसते हुए बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी॥1॥ |
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| Sanjay says- Maharaj! Acharya Drona laughingly started showering arrows on Pandu Nandan Bhimsen, who had come after crossing the chariot army, in the battle. 1॥ |
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