श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 62-64
 
 
श्लोक  7.122.62-64 
स वध्यमानो बहुभि: सायकैस्तैर्महाबल:॥ ६२॥
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं भग्नवेग: पराक्रमी।
आरुह्य स्वरथं वीर: प्रगृह्य च महद् धनु:॥ ६३॥
विव्याध समरे द्रोणं धृष्टद्युम्नो महारथ:।
द्रोणश्चापि महाराज शरैर्विव्याध पार्षतम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
उन असंख्य बाणों से घायल होकर महाबली धृष्टद्युम्न वेगहीन होकर रथ से कूद पड़े। फिर अपने रथ पर चढ़कर, हाथ में महान धनुष लेकर, वे वीर योद्धा धृष्टद्युम्न युद्धभूमि में द्रोणाचार्य को घायल करने लगे। महाराज! द्रोणाचार्य ने भी अपने बाणों से द्रुपदपुत्र को घायल कर दिया। 62-64।
 
The mighty and valiant Dhrishtadyumna, wounded by those numerous arrows, jumped from that chariot as his momentum was lost. Then, climbing back on his chariot, that valiant warrior Dhrishtadyumna, with his great bow in his hand, began to pierce Dronacharya in the battlefield. Maharaj! Dronacharya also wounded the son of Drupada with his arrows. 62-64.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)