रुवन्तो विविधान् नादान् जलदोपमनि:स्वना:।
नाराचैर्वत्सदन्तैश्च भल्लैरञ्जलिकैस्तथा॥ २७॥
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च सात्वतेन विदारिता:।
क्षरन्तोऽसृक् तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवु:॥ २८॥
अनुवाद
उनकी तुरही की ध्वनि बादलों की गर्जना के समान प्रतीत हो रही थी। सात्यकि द्वारा छोड़े गए नाराच, वत्सदंत, भल्ल, अंजालिक, क्षुरप्र और अर्धचंद्र नामक बाणों से बिंधे हुए वे नाना प्रकार से चिल्लाते, रक्त बहाते तथा मल-मूत्र त्यागते हुए भाग रहे थे।
The sound of their trumpeting seemed like the roar of the clouds. Pierced by the arrows named Naracha, Vatsadanta, Bhall, Anjalika, Kshurapra and Ardhachandra shot by Satyaki, they were running away crying in various ways, shedding blood and emitting urine and feces.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥