श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 112: सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना  »  श्लोक 38-40h
 
 
श्लोक  7.112.38-40h 
एतद् दुर्योधनो लब्ध्वा समग्रं राजमण्डलम्॥ ३८॥
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम्।
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान्॥ ३९॥
कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदित:।
 
 
अनुवाद
‘काल से प्रेरित होकर दुर्योधन द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, जयद्रथ और कर्ण इन सब राजाओं और श्रेष्ठ महारथियों को पाकर पाण्डवों का अपमान करता है और अपने को कृतार्थ मानता है।॥ 38-39 1/2॥
 
‘Inspired by time, Duryodhana, upon finding all these kings and the best of charioteers, Dronacharya, Krupacharya, Bhurishrava, Jayadratha and Karna, insults the Pandavas and considers himself fulfilled.॥ 38-39 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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