श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 112: सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.112.16-17 
यदेतत् कुञ्जरानीकं साहस्रमनुपश्यसि॥ १६॥
कुलमाञ्जनकं नाम यत्रैते वीर्यशालिन:।
आस्थिता बहुभिर्म्लेच्छैर्युद्धशौण्डै: प्रहारिभि:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! यह जो हजारों हाथियों की सेना आप देख रहे हैं, वह अंजनकुल कहलाती है। इसमें बलवान हाथी खड़े हैं, जिन पर आक्रमण करने में कुशल और युद्ध में निपुण बहुत से म्लेच्छ योद्धा सवार हैं॥16-17॥
 
‘Maharaj! This army of thousands of elephants that you see is called Anjanakul. In it, powerful elephants are standing, on whom many mlechha warriors who are skilled in attacking and adept in war are riding.॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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