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mahabharat 7.106.26-27h: इस प्रकार बड़ी कठिनाई में पड़कर धर्मराज युधिष्ठिर ने युद्ध में द्रोणाचार्य द्वारा काटे गए धनुष को त्यागकर दूसरा दिव्य धनुष उठा लिया, जो तेजस्वी और अत्यन्त वेगवान था।   |   mahabharat अध्याय 7.106: द्रोण और उनकी सेनाके साथ पाण्डव-सेनाका द्वन्द्वयुद्ध तथा द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करते समय रथ-भंग हो जानेपर युधिष्ठिरका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 106: द्रोण और उनकी सेनाके साथ पाण्डव-सेनाका द्वन्द्वयुद्ध तथा द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करते समय रथ-भंग हो जानेपर युधिष्ठिरका पलायन  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  7.106.26-27h 
स कृच्छ्रं परमं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिर:।
त्यक्त्वा तत् कार्मुकं छिन्नं भारद्वाजेन संयुगे॥ २६॥
आददेऽन्यद् धनुर्दिव्यं भास्वरं वेगवत्तरम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बड़ी कठिनाई में पड़कर धर्मराज युधिष्ठिर ने युद्ध में द्रोणाचार्य द्वारा काटे गए धनुष को त्यागकर दूसरा दिव्य धनुष उठा लिया, जो तेजस्वी और अत्यन्त वेगवान था।
 
Thus, being in a great difficulty, Dharmaraja Yudhishthira abandoned the bow which had been cut off by Dronacharya in the war and took up another divine bow which was luminous and extremely fast. 26 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)