श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 102: श्रीकृष्णका अर्जुनकी प्रशंसापूर्वक उसे प्रोत्साहन देना, अर्जुन और दुर्योधनका एक-दूसरेके सम्मुख आना, कौरव-सैनिकोंका भय तथा दुर्योधनका अर्जुनको ललकारना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.102.12 
बहूनि सुनृशंसानि कृतान्येतेन मानद।
युष्मासु पापमतिना अपापेष्वेव नित्यदा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
माननीय! आप सबने कभी भी उसकी बुराई नहीं की, फिर भी यह पापबुद्धि दुर्योधन आप सबके साथ सदैव क्रूरता से पेश आता रहा है ॥12॥
 
Honorable! You all never spoke ill of him, yet this sinful minded Duryodhan always treated you all cruelly. ॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)