श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 101: श्रीकृष्ण और अर्जुनको आगे बढ़ा देख कौरव-सैनिकोंकी निराशा तथा दुर्योधनका युद्धके लिये आना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.101.25 
उद्भिन्नरुधिरौ कृष्णौ भारद्वाजस्य सायकै:।
शितैश्चितौ व्यरोचेतां कर्णिकारैरिवाचलौ॥ २५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण और अर्जुन के शरीर द्रोणाचार्य के तीखे बाणों से छिद गए थे और उनसे रक्त बह रहा था। उस समय वे लाल कनेर से भरे दो पर्वतों के समान शोभायमान हो रहे थे।
 
The bodies of Shri Krishna and Arjun were pierced by the sharp arrows of Dronacharya and blood was flowing from them. At that time they looked beautiful like two mountains filled with red oleander. 25.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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