श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  7.100.27-28 
इत्येवं क्षत्रियास्तत्र ब्रुवन्त्यन्ये च भारत॥ २७॥
सिन्धुराजस्य यत् कृत्यं गतस्य यमसादनम्।
तत् करोतु वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! इसी प्रकार वहाँ अन्य क्षत्रिय भी निम्नलिखित बातें कहते थे - 'जो धर्ममार्ग को नहीं जानते और मिथ्या विचार रखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे यमलोक में गए हुए सिंधुराज जयद्रथ का अन्तिम संस्कार करें।'॥ 27-28॥
 
O Bharata! Similarly, the other Kshatriyas there used to say the following things - 'King Dhritarashtra, who does not know the right way and has wrong views, should perform the last rites of Sindhuraj Jayadratha, who has gone to Yamaloka.'॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)