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mahabharat 6.95.60-61: वह त्रिशूल अग्नि की चिनगारियों के समूह से सब ओर से घिरा हुआ था। उसे सहसा अपनी ओर आता देख प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भगदत्त ने एक अत्यन्त सुन्दर, तीक्ष्ण तथा मनोहर अर्द्धचन्द्राकार बाण चलाया। 60-61॥   |   mahabharat अध्याय 6.95: दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 95: दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध  »  श्लोक 60-61
 
 
श्लोक  6.95.60-61 
स विस्फुलिङ्गमालाभि: समन्तात् परिवेष्टित:॥ ६०॥
तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा प्राग्ज्योतिषो नृप:।
चिक्षेप रुचिरं तीक्ष्णमर्धचन्द्रं सुदारुणम्॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
वह त्रिशूल अग्नि की चिनगारियों के समूह से सब ओर से घिरा हुआ था। उसे सहसा अपनी ओर आता देख प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भगदत्त ने एक अत्यन्त सुन्दर, तीक्ष्ण तथा मनोहर अर्द्धचन्द्राकार बाण चलाया। 60-61॥
 
That trident was surrounded on all sides by a group of sparks of fire. Seeing him suddenly coming towards him, King Bhagdatta of Pragjyotishpur shot a very beautiful and very sharp and beautiful crescent-shaped arrow. 60-61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)