धृतराष्ट्र उवाच
यदिदं भारतं वर्षं यत्रेदं मूर्च्छितं बलम्।
यत्रातिमात्रलुब्धोऽयं पुत्रो दुर्योधनो मम॥ १॥
यत्र गृद्धा: पाण्डुपुत्रा यत्र मे सज्जते मन:।
एतन्मे तत्त्वमाचक्ष्व त्वं हि मे बुद्धिमान् मत:॥ २॥
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "संजय! इस भारतवर्ष का वास्तविक स्वरूप विस्तारपूर्वक वर्णन करो, जहाँ राजाओं की यह विशाल सेना युद्ध के लिए एकत्रित हुई है, जिसके साम्राज्य को प्राप्त करने के लिए मेरा पुत्र दुर्योधन लालायित है, जिसकी पाण्डव भी बहुत इच्छा रखते हैं और जो मुझे भी बहुत प्रिय है; क्योंकि मेरी दृष्टि में इस कार्य के लिए तुम ही सबसे बुद्धिमान हो।"
Dhritarashtra said, "Sanjaya! Describe in detail the true nature of this Bharatvarsh, where this huge army of kings has gathered for the war, whose empire my son Duryodhan is tempted to acquire, which the Pandavas also desire very much and which I too am very fond of; because in my view you are the most intelligent for this task." 1-2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥