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mahabharat 6.87.27: हे भारत! उस समय युद्ध में नाराच नामक तीखे बाण इस प्रकार गिर रहे थे मानो भयंकर सर्पों के समूह मुँह खोले हुए गिर रहे हों।   |   mahabharat अध्याय 6.87: आठवें दिन व्यूहबद्ध कौरव-पाण्डव-सेनाओंकी रणयात्रा और उनका परस्पर घमासान युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.87.27 
नाराचा निशिता: संख्ये सम्पतन्ति स्म भारत।
व्यात्तानना भयकरा उरगा इव संघश:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! उस समय युद्ध में नाराच नामक तीखे बाण इस प्रकार गिर रहे थे मानो भयंकर सर्पों के समूह मुँह खोले हुए गिर रहे हों।
 
O Bharata! In those days, the sharp arrows called 'Naraach' fell in the war as if hordes of fierce serpents were falling with their mouths wide open.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)