श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 68: ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  6.68.8-9 
शिरसा ते दिवं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी तथा।
जठरं ते त्रयो लोका: पुरुषोऽसि सनातन:॥ ८॥
एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नरा:।
आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चासि सत्तम:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
आपके सिर से स्वर्ग और भुजाओं से पृथ्वी फैली हुई है। आपके उदर में तीनों लोक स्थित हैं। आप सनातन पुरुष हैं। तप से शुद्ध हृदय वाले महापुरुष आपको इसी रूप में जानते हैं। आत्म-साक्षात्कार से संतुष्ट हुए बुद्धिमान मुनियों की दृष्टि में भी आप सर्वश्रेष्ठ हैं। ॥8-9॥
 
‘The heaven is spread by your head and the earth is spread by your arms. All the three worlds are situated in your stomach. You are the eternal man. Great men with pure hearts through austerity know you as such. You are the best even in the eyes of wise sages who are satisfied with self-realization. ॥ 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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