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श्लोक 6.68.5  |
वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा।
देव देवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत्॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| प्रभो! आप ही वसुओं में वासुदेव को और इंद्र को स्वर्ग के राज्य में प्रतिष्ठित करते हैं। हे प्रभु! आप ही देवताओं के भी देव हैं। महर्षि द्वैपायन भी आपके विषय में यही कहते हैं।॥5॥ |
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| ‘Lord! You are the one who establishes Vasudeva of the Vasus and Indra on the kingdom of heaven. O Lord! You are the god of the gods as well. Maharishi Dwaipayana says the same about you.॥ 5॥ |
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