श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 66: नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.66.2 
विदितं तात योगान्मे सर्वमेतत् तवेप्सितम्।
तथा तद् भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत॥ २॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! आपके मन में जो भी इच्छा है, उसे मैंने योगबल से जान लिया है। उसी के अनुसार सब कुछ होगा।' - ऐसा कहकर भगवान वहीं अन्तर्धान हो गए॥2॥
 
Father! Whatever desire you have in your mind, I have come to know it through the power of yoga. Everything will be done according to that.' - saying this, the Lord disappeared right there.॥ 2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas