श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 66: नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  6.66.16-17 
यत् तत् पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च॥ १६॥
एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम्।
एतत् परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ये ही पुरुष नाम से पुकारे जाते हैं, परन्तु इनका वास्तविक स्वरूप नहीं जाना जा सकता। ये ही जगत् के रचयिता ब्रह्माजी द्वारा परम सुख, परम तेज और परम सत्य कहे गए हैं।॥16-17॥
 
‘These are the ones who are called by the name Purusha, but their real form cannot be known. These are the ones who are called the ultimate happiness, the ultimate brilliance and the ultimate truth by Brahmaji, the creator of the universe.॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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