श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक d4h-42
 
 
श्लोक  6.50.d4h-42 
यथोक्त: स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता यथा।
(बार्हस्पत्येन विधिना व्यूहमार्गविचक्षण:।)
प्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनंजयम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जैसे वज्रधारी इन्द्र भगवान विष्णु से कहते हैं, वैसे ही युधिष्ठिर के पूर्वोक्त वचन सुनकर युद्धयोजना में कुशल नरदेव धृष्टद्युम्न ने प्रातःकाल (सूर्योदय से पूर्व) बृहस्पतिदेव द्वारा बताई विधि के अनुसार सम्पूर्ण सेना की युद्धयोजना बनाई; अर्जुन को आगे की पंक्ति में खड़ा किया॥ 42॥
 
Just as the thunderbolt-wielding Indra speaks to Lord Vishnu, similarly, after the aforesaid words of Yudhishthira, the lord of men, Dhrishtadyumna, skilled in battle formation, formed the battle formation of the entire army in the morning (before sunrise) as per the method prescribed by Brihaspati; he made Arjun stand in the front row.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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