श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.50.5 
कथमेनं महात्मानं शक्ष्याम: प्रतिवीक्षितुम्।
लेलिह्यमानं सैन्यं मे हविष्मन्तमिवानलम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे अग्निदेव अग्नि से प्रज्वलित होकर अग्नि की हवन सामग्री ग्रहण करते हैं, वैसे ही ये महामनस्वी भीष्म अपनी बाणरूपी जिह्वा से मेरी सेना को चाट रहे हैं। हम लोग उनकी ओर कैसे देख सकेंगे - उनका सामना कैसे कर सकेंगे?॥5॥
 
‘Just as the fire god Agni, blazing with fire, accepts the offerings of fire, similarly this great-minded Bhishma is licking my army with his arrow-like tongue. How will we be able to look at him – how will we be able to face him?॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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