श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  6.50.45-46h 
नृत्यमान इवाभाति रथचर्यासु मारिष।
तेन रत्नवता पार्थ: स च गाण्डीवधन्वना॥ ४५॥
बभूव परमोपेत: सुमेरुरिव भानुना।
 
 
अनुवाद
आर्य! अर्जुन की ध्वजा रथपथ पर नाचती हुई प्रतीत हो रही थी। वह रत्नजटित ध्वजा अर्जुन को सुशोभित कर रही थी और गांडीवधारी अर्जुन उस ध्वजा को उसी प्रकार सुशोभित कर रहे थे, जैसे मेरु पर्वत पर सूर्य सुशोभित है और सूर्य मेरु पर्वत को सुशोभित करता है।
 
Arya! Arjuna's flag appeared to be dancing on the chariot paths. That gem-studded flag adorned Arjuna and the Gandiva-wielding Arjuna adorned that flag, just like the Sun is adorned by Mount Meru and the Sun adorns Mount Meru. 45 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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