श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  6.50.38-39 
अथोत्क्रुष्टं महेष्वासै: पाण्डवैर्युद्धदुर्मदै:॥ ३८॥
समुद्यते पार्थिवेन्द्रे पार्षते शत्रुसूदने।
तमब्रवीत् तत: पार्थ: पार्षतं पृतनापतिम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर युद्ध के लिए उन्मत्त हुए महाधनुर्धर पाण्डवों ने बड़े जोर से सिंहनाद किया और जब शत्रुओं में श्रेष्ठ द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न युद्ध के लिए तैयार हो गए, तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिर ने सेनापति द्रुपद कुमार से पुनः इस प्रकार कहा- 38-39॥
 
Hearing this, the great archers, the Pandavas, who were in a frenzy for the war, raised a loud lion's cry and when Dhrishtadyumna, the son of Drupada, the best enemy of the enemy, got ready for the war, Kuntikumar Yudhishthir again said to the commander Drupada Kumar thus - 38-39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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