श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 26-29h
 
 
श्लोक  6.50.26-29h 
मा शुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि॥ २६॥
यस्य ते भ्रातर: शूरा: सर्वलोकेषु धन्विन:।
अहं च प्रियकृद् राजन् सात्यकिश्च महायशा:॥ २७॥
विराटद्रुपदौ चेमौ धृष्टद्युम्नश्च पार्षत:।
तथैव सबलाश्चेमे राजानो राजसत्तम॥ २८॥
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशाम्पते।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! आप शोक न करें। इस प्रकार शोक करना आपके योग्य नहीं है। आपके वीर भाई संसार भर में विख्यात धनुर्धर हैं। राजन! मैं भी आपका प्रेमी हूँ। श्रेष्ठ! पराक्रमी सात्यकि, विराट, द्रुपद, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न तथा ये सभी राजा अपनी सेना सहित आपकी कृपा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। महाराज! ये सभी आपके भक्त हैं। 26—28 1/2॥
 
‘Bharatshrestha! Don't you mourn. It is not worthy of you to mourn like this. Your brave brothers are renowned archers throughout the world. Rajan! I am also your lover. The best! The mighty Satyaki, Virata, Drupada, Drupada's son Dhrishtadyumna and all these kings along with their army wait for your blessings. Maharaj! All of them are your devotees. 26—28 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas