श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  6.50.25-26h 
एवमुक्त्वा तत: पार्थो ध्यायन्नास्ते महामना:।
चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतन:।
शोकार्तं तमथो ज्ञात्वा दु:खोपहतचेतसम्॥ २५॥
अब्रवीत् तत्र गोविन्दो हर्षयन् सर्वपाण्डवान्।
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर महाबली युधिष्ठिर शोक से व्याकुल होकर मन को अंतर्मुख करके बहुत देर तक ध्यान में बैठे रहे। युधिष्ठिर को शोक से व्याकुल और उनका मन शोक से व्याकुल जानकर, समस्त पाण्डवों का हर्ष बढ़ाते हुए गोविन्द ने कहा -॥25 1/2॥
 
Having said this, the great Yudhishthira, distraught with grief, sat in meditation for a long time, turning his mind inward. Knowing that Yudhishthira was distraught with grief and his mind was troubled with sorrow, Govinda, increasing the joy of all the Pandavas, said -॥ 25 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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