श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  6.50.13 
मत्कृते भ्रातृहार्देन राज्याद् भ्रष्टास्तथा सुखात्।
जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
ये लोग मेरे भाई-बन्धुओं के सौहार्द के कारण राज्य और सुख से वंचित होकर दुःख भोग रहे हैं। इस समय मैं अपना और उनका जीवन बहुत अच्छा समझता हूँ; क्योंकि अब तो जीवन भी दुर्लभ है॥13॥
 
‘These people are suffering because of the cordiality of my brothers and sisters, deprived of their kingdom and happiness. At this time, I consider their lives and mine to be very good; because now even life is rare.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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