श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.50.12 
क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतो: पराक्रमी।
भ्रातरश्चैव मे वीरा: कर्शिता: शरपीडिता:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वार्ष्णेय! राज्य के लिए वीरतापूर्वक कर्म करते हुए मैं सब प्रकार से दुर्बल हो रहा हूँ। मेरे वीर भाई बाणों से घायल होकर अत्यंत क्षीण हो रहे हैं॥12॥
 
Varshneya! By performing heroic deeds for the kingdom I am becoming weak in every way. My brave brothers are becoming extremely emaciated after being hit by arrows.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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