श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  6.50.1-3 
संजय उवाच
कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रथमे भरतर्षभ।
भीष्मे च युद्धसंरब्धे हृष्टे दुर्योधने तथा॥ १॥
धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दनम्।
भ्रातृभि: सहित: सर्वै: सर्वैश्चैव जनेश्वरै:॥ २॥
शुचा परमया युक्तश्चिन्तयान: पराजयम्।
वार्ष्णेयमब्रवीद् राजन् दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! पहले दिन के युद्ध में जब पाण्डव सेना पीछे हट गई, तब भीष्म का युद्ध के प्रति उत्साह बढ़ता ही गया और दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हुआ, उस समय धर्मराज युधिष्ठिर अपने समस्त भाइयों तथा समस्त राजाओं के साथ तुरंत भगवान श्रीकृष्ण के पास गए और भीष्म का पराक्रम देखकर अत्यंत शोकाकुल होकर अपनी पराजय से चिन्तित होकर भगवान श्रीकृष्ण से इस प्रकार बोले- 1-3॥
 
Sanjay says- Bharatshrestha! In the first day's war, when the Pandava army was driven back, Bhishma's enthusiasm for the war kept on increasing and Duryodhana became extremely happy, at that time Dharmaraja Yudhishthir along with all his brothers and all the kings immediately went to Lord Shri Krishna and after seeing the bravery of Bhishma and being extremely grief stricken, worried about his defeat, spoke to Lord Shri Krishna thus - 1-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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