श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  6.43.82 
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवै:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। महाराज! यह सत्य है। मैं कौरवों के द्वारा धन से बंधा हुआ हूँ। 82.
 
Man is a slave of wealth, wealth is not a slave of anyone. Maharaj! This is true. I am bound by wealth through the Kauravas. 82.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)