श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 38: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.38.7 
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भ‍वम् ।
तन्निबध्‍नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण अनन्त इच्छाओं तथा तृष्णाओं से उत्पन्न होता है और इसी कारण देहधारी आत्मा सकाम कर्मों से बंध जाती है।
 
O son of Kunti, the mode of passion arises from infinite desires and cravings, and it is because of this that the embodied soul becomes bound by fruitive actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)