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mahabharat 6.37.29: जो व्यक्ति ईश्वर को सर्वत्र और प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान देखता है, वह अपने मन से स्वयं को भ्रष्ट नहीं करता। इस प्रकार वह अपने दिव्य लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 6.37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  6.37.29 
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति ईश्वर को सर्वत्र और प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान देखता है, वह अपने मन से स्वयं को भ्रष्ट नहीं करता। इस प्रकार वह अपने दिव्य लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
 
A person who sees God present everywhere and in every living being equally does not corrupt himself through his mind. In this way, he attains his divine destination.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)