यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २७ ॥
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी तुम चर और अचर देखते हो, उसे कर्मक्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग मात्र समझो।
O best of the Bharatas! Know that whatever movable and immovable you see in existence is merely a combination of the field of action and the knower of the field.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥