श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  6.37.27 
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी तुम चर और अचर देखते हो, उसे कर्मक्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग मात्र समझो।
 
O best of the Bharatas! Know that whatever movable and immovable you see in existence is merely a combination of the field of action and the knower of the field.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)