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श्री महाभारत
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पर्व 6: भीष्म पर्व
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अध्याय 37: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
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श्लोक 20
श्लोक
6.37.20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ २० ॥
अनुवाद
प्रकृति और जीवों को शाश्वत मानना चाहिए। उनके परिवर्तन और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं।
Nature and living beings should be considered eternal. Their changes and qualities are born of nature.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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