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mahabharat 6.33.27: हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ भी करते हो, जो कुछ भी खाते हो, जो कुछ भी अर्पण या दान करते हो, तथा जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पण करो।   |   mahabharat अध्याय 6.33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.33.27 
यत्करोषि यदश्न‍ासि यज्ज‍ुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ भी करते हो, जो कुछ भी खाते हो, जो कुछ भी अर्पण या दान करते हो, तथा जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पण करो।
 
O son of Kunti, whatever you do, whatever you eat, whatever you offer or donate, and whatever austerity you perform, do it as an offering to Me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)