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mahabharat 6.33.24: मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता और स्वामी हूँ। अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते, वे नीचे गिर जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.33.24 
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्‍च्‍यवन्ति ते ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता और स्वामी हूँ। अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते, वे नीचे गिर जाते हैं।
 
I am the only enjoyer and master of all sacrifices. Therefore, those who do not recognize My real transcendental nature fall down.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)